मुख्यधारा का मीडिया इस समय एक ही घिसी-पिटी कहानी बेचने में लगा है। हेडलाइंस चीख-चीखकर कह रही हैं—"अब कोई समझौता नहीं होगा, अपना हक लेकर रहेंगे!" दावा किया जा रहा है कि युद्ध के तीन महीने बाद ईरान ने अपनी रहस्यमयी 'चुप्पी' तोड़ी है और वह मध्य पूर्व में एक नया मोर्चा खोलने जा रहा है।
यह पूरा नैरेटिव न सिर्फ सतही है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति की बुनियादी समझ से परे है। If you enjoyed this article, you might want to read: this related article.
सच्चाई इसके ठीक उलट है। जिसे मीडिया 'हुंकार' कह रहा है, वह असल में अपनी साख बचाने की एक हताश कोशिश है। तीन महीने की यह चुप्पी कोई रणनीतिक सन्नाटा नहीं था, जिसे किसी बड़े धमाके के लिए खींचा गया हो। यह एक ऐसी रियासत की लाचारी थी, जिसके पास अपनी घरेलू जनता और क्षेत्रीय प्रॉक्सीज़ को देने के लिए खोखले वादों के अलावा कुछ नहीं बचा है। जब आपके पास खोने के लिए सब कुछ हो और करने के लिए कुछ न हो, तो आप वही करते हैं जो ईरान ने किया—लाउडस्पीकर पर आकर दहाड़ना।
प्रोपेगैंडा बनाम हकीकत: ईरान युद्ध क्यों नहीं लड़ सकता
युद्ध भावनाओं से नहीं, बल्कि बैलेंस शीट, सप्लाई चेन और सैन्य क्षमता से लड़े जाते हैं। आइए उस 'आलसी सहमति' की धज्जियां उड़ाते हैं जो ईरान को एक अजेय महाशक्ति के रूप में पेश करती है। For another perspective on this event, check out the recent update from The New York Times.
जब तेहरान से बयान आता है कि "अब कोई समझौता नहीं होगा," तो पर्दे के पीछे चल रही असलियत को समझना ज़रूरी है। ईरान इस समय तीन मोर्चों पर पूरी तरह घिरा हुआ है:
1. खोखली अर्थव्यवस्था और प्रतिबंधों का जाल
कोई भी देश खाली पेट और खाली खजाने के साथ लंबा युद्ध नहीं खींच सकता। दशकों के कड़े प्रतिबंधों ने ईरान की मुद्रा (रियाल) को इतिहास के सबसे निचले स्तर पर पहुंचा दिया है। महंगाई आसमान छू रही है और देश का इंफ्रास्ट्रक्चर दम तोड़ रहा है। जब देश के भीतर ही बिजली और पानी की किल्लत के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हों, तब हजारों किलोमीटर दूर एक नया सैन्य मोर्चा खोलना आत्मघाती कदम होगा।
2. प्रॉक्सी नेटवर्क की रीढ़ का टूटना
ईरान की असली ताकत कभी उसकी अपनी पारंपरिक सेना नहीं रही। उसकी ताकत लेबनान में हिज़्बुल्लाह, यमन में हूथी और गाजा में हमास जैसे संगठन रहे हैं। पिछले कुछ महीनों में इस 'एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस' के शीर्ष नेतृत्व को जिस तरह निशाना बनाया गया है, उसने ईरान के रिमोट कंट्रोल को पंगु बना दिया है। जब आपके सबसे मजबूत मोहरे ही मैदान में बिखर रहे हों, तो केंद्र से दी गई धमकी सिर्फ एक खोखली गूंज बनकर रह जाती है।
3. घरेलू मोर्चे पर सुलगता असंतोष
इतिहास गवाह है कि बाहरी दुश्मनों से निपटने से पहले अंदरूनी मोर्चे को संभालना जरूरी होता है। 'महिला, जीवन, स्वतंत्रता' आंदोलन के बाद से ईरान के भीतर आम जनता और सत्ताधारी शासन के बीच की खाई इतनी चौड़ी हो चुकी है कि उसे पाटना नामुमकिन है। ईरान के नीति नियंताओं को अच्छी तरह पता है कि अगर उन्होंने किसी बड़े युद्ध में सीधे कदम रखा, तो देश के भीतर की असंतुष्ट आवाजें उनके अपने तख्तो-ताज को पलट देंगी।
वह सवाल जो कोई नहीं पूछ रहा: तीन महीने तक चुप क्यों थे?
मुख्यधारा के पत्रकार इस सवाल को छूने से भी कतराते हैं कि आखिर ईरान को बोलने में तीन महीने का वक्त क्यों लगा? जवाब बहुत सीधा और कड़वा है।
ईरान एक ऐसी कूटनीतिक कश्ती पर सवार है जिसके दोनों तरफ छेद हैं। वह अपने कट्टर समर्थक गुटों को यह दिखाना चाहता है कि वह अब भी उनके साथ खड़ा है, लेकिन साथ ही वह वाशिंगटन और तेल अवीव को ऐसा कोई सीधा मौका नहीं देना चाहता जिससे उसके परमाणु ठिकानों पर सीधा हमला हो जाए।
यह तीन महीने का सन्नाटा कोई तैयारी नहीं थी। यह अमेरिका के साथ पर्दे के पीछे चल रही उस बैक-चैनल कूटनीति का समय था, जहां ईरान लगातार अपनी संप्रभुता और अपने परमाणु कार्यक्रम को बचाने की भीख मांग रहा था। जब उन गुप्त वार्ताओं से कुछ ठोस निकलकर नहीं आया और घरेलू दबाव असहनीय हो गया, तब जाकर यह बयान जारी किया गया ताकि दुनिया को लगे कि ईरान अभी मरा नहीं है।
लोगों के मन के भ्रम: क्या ईरान के पास 'परमाणु विकल्प' है?
अक्सर पूछा जाता है कि क्या ईरान परमाणु बम बनाकर खेल के नियम बदल सकता है?
यह एक और बड़ा भ्रम है। ईरान के पास यूरेनियम को उच्च स्तर तक संवर्धित (enrich) करने की तकनीक जरूर है, लेकिन एक चालू परमाणु हथियार बनाना और उसे डिलिवरेबल मिसाइल सिस्टम पर फिट करना पूरी तरह अलग बात है। जैसे ही ईरान उस 'रेड लाइन' को पार करने की कोशिश करेगा, वह इजरायल और अमेरिका को एक ऐसा वैध कारण दे देगा जिसकी तलाश वे सालों से कर रहे हैं। ईरान की वायुसेना और उसकी हवाई रक्षा प्रणाली (Air Defense) इतनी सक्षम नहीं है कि वह पश्चिमी देशों के आधुनिक स्टेल्थ फाइटर्स और मिसाइलों के सामूहिक हमले को झेल सके।
तेहरान के रणनीतिकार बेवकूफ नहीं हैं। वे जानते हैं कि परमाणु बम की धमकी सिर्फ तभी तक काम करती है जब तक उसे बनाया न जाए। एक बार जब आप उसे बनाने की आखिरी स्टेज में कदम रखते हैं, तो आपकी पूरी बिसात पलट दी जाती है।
इस खोखली बयानबाजी का अगला सच
तो अब आगे क्या होगा? क्या ईरान अपनी बात पर कायम रहकर कोई बड़ा हमला करेगा?
बिलकुल नहीं। ईरान की रणनीति हमेशा से 'असममित युद्ध' (Asymmetric Warfare) की रही है। वह सीधे टकराव से बचेगा। आने वाले दिनों में आपको लाल सागर में जहाजों पर हूथियों के हमले बढ़ते हुए दिख सकते हैं, या फिर साइबर स्पेस में कुछ सरकारी वेबसाइट्स को हैक करने की खबरें आ सकती हैं। इसके अलावा जो कुछ भी होगा, वह सिर्फ और सिर्फ बयानों का एक और दौर होगा।
जब कोई देश कहता है कि "अपना हक लेकर रहेंगे", तो असल में वह मान चुका होता है कि उसका हक पहले ही छीना जा चुका है और उसके पास उसे वापस लेने की कोई वास्तविक ताकत नहीं बची है।
यह कोई गर्जना नहीं है। यह एक ढहते हुए साम्राज्य की आखिरी हिचकी है।